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Tuesday, 24 January 2017

अमर जवान

ये वीर कर्मठ, अटल हैं,
जननी जिनकी धरा है,
हाथ बन्दूक, सीना तान,
लोहा लेने खड़ा है,
आंच ना आने पाए वतन पे,
इसी जिद पे अड़ा है,
खून के अंतिम कतरे तक,
वतन के लिए लड़ा है,

वतन के नाम कर दी,
जिसने अपनी जवानी,
हँसते हँसते लड़ गए,
दे दी अपनी कुर्बानी,
तिरंगा जिनका कफ़न बना,
वो सपूत था तूफानी,
नाम उनके याद रख लेना,
सुनाना वीरता की कहानी,

आंसू गर आये कभी,
किसी शहीद की याद में,
उन्हें बह जाने देना,
कोई पूछे वजह,
तो बस इतना बतला देना,
भारत माँ की सेवा में,
अपनी माँ को छोड़ गया,
जन्म लिया एक कोख से,
दूजी की गोद में सो गया।

Friday, 20 January 2017

वेदना

खुशनुमा हुआ करती थी,
अब जिंदगी खामोश है,
एक से दूजा डर रहा,
हर आदमी बदहोश है,
भाव है डरे हुए,
हर भावना भयभीत है,
ए खुदा तू है कहाँ,
कैसी ये तेरी प्रीत है,
दायरा गर टुटा,
सब कुछ बहा ले जाएगा,
कमजोरी को ताकत बना,
तूफ़ान भी थम जाएगा,
मूरत बन रुको नहीं,
सच हो, तुम वीर हो,
एक आवाज भी अधिक है,
तुम जान हो, शरीर हो,
छटपटाती, ब्यथित, व्याकुल,
इंसान के मन में रोष है,
खुशनुमा हुआ करती थी,
अब जिंदगी खामोश है।

Friday, 6 January 2017

आस

हर कदम पे तेरे साथ ही चला था,
ना जाने तू कैसे आगे निकल गयी,
किस्मत में जो लिखा था, उसे मिटा कर,
रेत की तरह तू, हाथों से फिसल गयी,
तुम तो हर पल साँसों में बसते थे,
तुम तो हर पल बाहों में रहते थे,
क्यूँ अब तुम करीब नहीं आते हो,
क्यूँ दर्द बन आँखों से बह जाते हो,
तू सीने की धड़कन थी, तुझमे ही जीता था,
जख्म लगे गर कभी मुझे, मुस्कान से तेरी सीता था,
घाव देकर उम्र भर का, तू कहीं और मुस्काती है,
किश्तों में आकर याद तेरी, दिल को बहुत सताती है,
मेरी दुनिया से गए तुम्हे एक ज़माना हो गया,
और हम, अब भी तुम्हारे लौट आने की आस लगाए बैठे हैं,
ग़मों की परछाई ने कर दिया मुझे अँधेरे के हवाले,
और हम, रौशनी के लिए अपना दिल जलाये बैठे हैं,
हम अब भी तुम्हारे लौट आने की आस लगाए बैठे हैं,
हम अब भी तुम्हारे लौट आने की आस लगाए बैठे हैं।

Written by: Upendra Prasad
Edited By: Abhisek Kumar Jha

Tuesday, 27 December 2016

अकेला

साहिल पे बैठा मैं,
समंदर की लहरें गिन रहा था,
घनघोर अँधेरा पसरा हुआ था,
अंदर और बाहर के हालात एक ही थे,
शायद वो रात,
अमावस की रात थी,
मेरा चाँद,
मुझसे दूर हो गया था,
पर आसमान में चमकते सितारे,
दिलासा दे रहे थे,
पैरो को छूकर जाने वाली,
लहरें भी कह रही थी,
तुम अकेले नहीं, 
हम सब तुम्हारे साथी हैं,
अब रोज साहिल में बैठ,
इन लहरों से बातें करना,
अच्छा लगता है,
वो तो दिल तोड़ गयी,
पर टूटे दिल को जुड़ने में,
वक़्त तो लगता है।

Monday, 26 December 2016

अभागिन

सूना है आँगन, सूने गलियारे,
सूनी है मन की सेज रे,
सुख गए हैं, आखों के आंसू,
हालत तो आकर देख रे,
चिट्ठी या तार, कुछ तो भिजवा दे,
लेने को मेरी टोह रे,
अब तो जिया न जाए अकेले,
तड़पे हैं जियरा रोज रे,
तड़प रही है रूह मेरी,
और कितना तड़पाओगे,
हर सुबह टूटता एक सपना,
कितने सपने दिखाओगे,
कर के सपने पूरे अपने,
जिस दिन वापस आओगे,
छोड़ गए थे जिस चौखट पे,
वही खड़ी पाओगे,
तुम कब आओगे, गले से लगाओगे,
पहना के मुझको, फूलों की माला,
कब अपने हाथों से सजाओगे ?

Monday, 14 November 2016

वो

बस एक नाम बन कर वो मेरी जिंदगी में आयी थी,
अब तो उनके जिक्र भर से होठों पे मुस्कान चली आती है।

Sunday, 13 November 2016

आदमी

निकट शाम को, गोधूलि बेला में,
यूँही पैदल निकल जाता हूँ,
जीवन की धुप-छाँव में,
ऐसे ही मन बहलाता हूँ,
सुख की परवाह नहीं मुझे,
दुखों की गिनती करता जाता हूँ,
मन की पीड़ा आंसू बन निकलते,
ऐसे ही मन बहलाता हूँ,
आदमी हूँ, कष्ट तो स्वाभाविक है,
उसे मुखौटा ओढ़ छुपाता हूँ,
धरा पर ऐसा मैं अकेला नहीं,
ऐसे ही मन बहलाता हूँ।