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Wednesday, 25 May 2016

सूखे पत्ते

कुछ पत्ते सुख से गए थे , कुछ में नमी अभी बची थी,
कुछ परत दर परत जमीन पे परे थे,
मानो एक सुर्ख सी सेज सजी हो,
झील की गहराई सा सन्नाटा पसरा हुआ था चहु ओर,
मानो किसी आपात स्थिति से लरने को निःशब्द खरे थे.


टूटकर शाखों से जब जमीन पे ये गिरे थे,
अपने से टूट के अपनों से जब मिले थे,
एक अनोखी सी दर्द का एहसास,
तो कभी ख़ुशी से दिल खिले थे.

जो परा रहा जमीन पे, सबके भार को उठाये,
आज अपने साथियों से बिदाई ले रहा है,
अपने कंधे की जिम्मेदारी किसी और पे सजाके,
मिटटी का था वो जन्मा, आज मिटटी में मिल रहा है.

फिर, सरसराती हुयी हवा ने मंजर बदल दिया,
जो शाखों पे सजे थे कभी, अब जमीन पे परे है,
जो जमीन पे परे थे, अपनी जननी के आँचल तले,
वे भी टूट कर यत्र तत्र बिखरे परे है.

अब जब बसंत आएगी ..  नयी उमंगो के साथ,
नए कोपले फूटेगी, फिर हरियाली  का बसेरा होगा,
सूखे  पत्तो के जगह, हरी हरी घास लहलहायेंगी,
हर्षित होंगे सारे मन, फिर खुशियाली का सबेरा होगा. 

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