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Wednesday, 25 May 2016

पर्वत-सागर

पर्वत की उंचाई से ज्यादा,
सागर की गहराई से ज्यादा,
मैंने इक से प्यार किया,
वो तो दिल को तोड़ गयी,
सागर में पर्वत छोड़ गयी,
अब ना तो कोई पर्वत है,
ना ही कोई सागर है,
बस प्यार कहीं पे जिन्दा है,
मन के किसी एक कोने में,
और याद बची है साथ मेरे,
काम आती है रोने मे।

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