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Wednesday, 25 May 2016

मौन सिपाही

जिंदगी का किनारा
सुनसान रास्ता
और उस रास्ते का
एक अकेला राही
प्रतीत होता है ऐसा
इस मौन दुनिया का
रह गया मैं अकेला
एक मौन सिपाही !

बुने थे ढेरों सपने
कहाँ रहे वो अपने
किये थे जितने कर्म
लगे सब संगीन जुर्म
अपने हाथों मैंने
अपनी लुटिया डुबाई
बीच मझधार में
कभी डूबी कभी उतराई
गम का रहा हमेशा साथ
खुशियों के चौखट पार
करने की मानो थी मनाही
इस मौन दुनिया का
रह गया मैं अकेला
एक मौन सिपाही !

हिम्मत टूट गयी
रिश्ते रूठ गए
आँखों में चुभने वाले
किस्से छुट गए
जिनसे थी साथ
की उम्मीद
उन्होंने ही मेरे
भरोसे की दीवार ढाही
इस मौन दुनिया का
रह गया मैं अकेला
एक मौन सिपाही !

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