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Wednesday, 25 May 2016

बेजान दिल

तेरा हँसना, तेरा इठलाना, चुप होकर फिर धीरे से तेरा मुस्काना,
कभी पलकों के साए में, अपनी आँखों की शरारतों को छुपाना,
बहुत याद आता है, मेरा एकटक सिर्फ तुझे ही निहारना,

वो बाँहों में बाँहे, घंटो तक नंगे पाँव रेत पे टहलना,
कितनी खूबसूरत होती थी वो शाम, और साथ में सूरज का ढलना,
तड़पाती है बहुत मुझको, तेरी कमी का खलना,

उदास होती थी तू, फिर मेरे कंधे पे सर रख के तेरा रोना,
खुद को भुलाकर, मेरा, तेरे दर्द के आंसुओ में खोना,
सिमटे होते थे जहां एक दूजे में, सूना पड़ गया घर का वो कोना,

दर्द इतना ही बढ़ गया था, की ये नाजुक दिल सह ना पाया,
हँसना सिखा था तेरे संग, बिन तेरे मुझे जीना भी ना आया,
जिंदगी की धुप में तनहा ही जला था, मुझे कभी चैन ना आया,
लकड़ियों की तपती सेज पे ही इस बेजान दिल को आराम आया,

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