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Wednesday, 25 May 2016

वो बचपन

कभी खेल के मैदान में गिरते,
कभी पेड़ों कि उंचाईओं को नापते,
कभी होती साइकिल कि रेसिंग,
तो कभी बारिश में भीग के कांपते,
उन सब का अपना मजा था,
वो हमारा बचपन था।

सुबह का उठना बड़ा कठिन था,
बाकी दिन के हम राजा होते थे,
परीक्षा के नाम पे रातों को जागते,
छुट्टियों में दिन भर सोते थे,
चिंता से परे स्वर्ग सा जीवन था,
वो हमारा बचपन था।

दोस्तों के लिए हरदम तैयार,
नादानियों का था वो संसार,
कभी मार खा के रोते थे,
कभी मार के खुश होते थे,
वो अलग ही जज्बा था,
वो हमारा बचपन था।

अब तो कभी छत पे,
कभी बरामदे में,
तो कभी चाय कि दूकान पे,
हमारा खाली वक़्त गुजरता है,
गुजरे दिनों कि याद,
हमेशा हमसे कहता है,
वक़्त तो वक़्त है,
वो तो ऐसे ही बदलता है,
अब जो हमारी मुस्कुराहट है,
उन दिनों का हमारा चहकना  था,
वो हमारा बचपन था।।

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