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Thursday, 26 May 2016

किताबेँ

किताबों से जो नाता था पुराना,
वो अब कट सा गया है,
वो नाता था अनोखा,
शायद अब भी कुछ रह सा गया है।
कभी हाथों में तो कभी सिरहाने तले,
कभी छाती पे तो कभी गोद में डेरा जमाते थे,
जुबां पर एक अलहदा जायका आता था,
जब कभी पन्नों को पलटाते थे।
नयी किताबों की खुशबू एक अलग एहसास था,
जब हम किताब से नाक को ढके पूरी सांस अंदर भरते थे,
अलग स्नेह होता था तब,
जब हमारे हस्ताक्षर पहले पन्ने पे हुआ करते थे।
अब नया है माहौल और नयी है जमीन,
जहाँ होता था किताबों का ढेर, अब होती है मशीन,
अब न हाथों में , ना सिरहाने तले,
अब तो वो अलमारियों की तख्तों पे सजती है,
महीनो तक अब मुलाकातें नहीं होती,
बड़ी हसरत से वो तकती है।
वो दौर ही अलग था,
जब किताबों से सूखे फूलों की खुशबू आती थी,
उन्हें गिराने और उठाने में कितने रिश्ते बनते थे,
अब वो दौर कहाँ,
अब तो वो अलमारियों की तख्तों पे सजती है,
महीनो तक अब मुलाकातें नहीं होती,
बड़ी हसरत से वो तकती है।

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