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Thursday, 9 June 2016

फरियाद

मानसून की बेला है,
ये बूँदों का मेला है,
झमझम करते सावन ने,
तन को मेरे भिगो दिया,,
अतिरेक उल्लास ने फिर,
मन को मेरे भिगो दिया,
फिर बारिश घनघोर हुई,
धरती भी सराबोर हुई,
पर जहाँ है सुखा,
हर बच्चा भूखा,
सुखी माटी सुनी है,
हर राहत अनसुनी है,
एक बूँद के लिए, गयें हैं तरस,
ए बारिश जरा उधर भी बरस,

बारिश होगी, जीवन होगा,
हर समां रंगीन होगा,
हरियाली लहरायेगी,
कई मुखड़े खिल सी जायेगी,
नयी कोंपलें संग,
नयी जीवन की शुरुआत होगी,
सूखे डालों पर,
जब बूँदों की बरसात होगी,
हर कली को फूल और,
हर बाग़ को गुलशन कर जायेगी,
सावन की बूँदें जब,
प्यासी धरती से मिलने आएगी,
अब आँचल में बूँदें भर ले,
और याद उन्हें तू कर ले,
जिन्हे भूल गयी थी पिछले बरष,
ए बारिश जरा उधर भी बरस।

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