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Monday, 20 June 2016

मौसम की मार

पतझड़ की नहीं,
बस कुछ दिन पहले की बात है,
पेड़ों से हरियाली नदारद थी,
जमीन पे पड़े अधसूखे  पत्ते,
मौसम की मार को बयाँ कर रहे थे,
उनकी जीवन लीला अभी और थी,
वो असमय ही पेड़ों से गिर पड़े थे,

जिन तेज हवाओं में,
शाख और पत्तें साथ झूमा करते थे,
उनका साथ में लहलहाना भी,
एक मधुर संगीत की श्रिष्टि करता था,
शाख से जुदा क्या हुए,
पत्तो का कोई अस्तित्व ही न रहा,
तेज हवाओं की ठोकर ,
उन्हें जहाँ तहाँ बिखेर रही है,
अब  तो बस पत्तों की लाश बिछी है,
और रेगिस्तान सा माहौल है।




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