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Monday, 26 December 2016

अभागिन

सूना है आँगन, सूने गलियारे,
सूनी है मन की सेज रे,
सुख गए हैं, आखों के आंसू,
हालत तो आकर देख रे,
चिट्ठी या तार, कुछ तो भिजवा दे,
लेने को मेरी टोह रे,
अब तो जिया न जाए अकेले,
तड़पे हैं जियरा रोज रे,
तड़प रही है रूह मेरी,
और कितना तड़पाओगे,
हर सुबह टूटता एक सपना,
कितने सपने दिखाओगे,
कर के सपने पूरे अपने,
जिस दिन वापस आओगे,
छोड़ गए थे जिस चौखट पे,
वही खड़ी पाओगे,
तुम कब आओगे, गले से लगाओगे,
पहना के मुझको, फूलों की माला,
कब अपने हाथों से सजाओगे ?

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