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Tuesday, 27 December 2016

अकेला

साहिल पे बैठा मैं,
समंदर की लहरें गिन रहा था,
घनघोर अँधेरा पसरा हुआ था,
अंदर और बाहर के हालात एक ही थे,
शायद वो रात,
अमावस की रात थी,
मेरा चाँद,
मुझसे दूर हो गया था,
पर आसमान में चमकते सितारे,
दिलासा दे रहे थे,
पैरो को छूकर जाने वाली,
लहरें भी कह रही थी,
तुम अकेले नहीं, 
हम सब तुम्हारे साथी हैं,
अब रोज साहिल में बैठ,
इन लहरों से बातें करना,
अच्छा लगता है,
वो तो दिल तोड़ गयी,
पर टूटे दिल को जुड़ने में,
वक़्त तो लगता है।

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