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Monday, 20 June 2016

मौसम की मार

पतझड़ की नहीं,
बस कुछ दिन पहले की बात है,
पेड़ों से हरियाली नदारद थी,
जमीन पे पड़े अधसूखे  पत्ते,
मौसम की मार को बयाँ कर रहे थे,
उनकी जीवन लीला अभी और थी,
वो असमय ही पेड़ों से गिर पड़े थे,

जिन तेज हवाओं में,
शाख और पत्तें साथ झूमा करते थे,
उनका साथ में लहलहाना भी,
एक मधुर संगीत की श्रिष्टि करता था,
शाख से जुदा क्या हुए,
पत्तो का कोई अस्तित्व ही न रहा,
तेज हवाओं की ठोकर ,
उन्हें जहाँ तहाँ बिखेर रही है,
अब  तो बस पत्तों की लाश बिछी है,
और रेगिस्तान सा माहौल है।




Thursday, 9 June 2016

फरियाद

मानसून की बेला है,
ये बूँदों का मेला है,
झमझम करते सावन ने,
तन को मेरे भिगो दिया,,
अतिरेक उल्लास ने फिर,
मन को मेरे भिगो दिया,
फिर बारिश घनघोर हुई,
धरती भी सराबोर हुई,
पर जहाँ है सुखा,
हर बच्चा भूखा,
सुखी माटी सुनी है,
हर राहत अनसुनी है,
एक बूँद के लिए, गयें हैं तरस,
ए बारिश जरा उधर भी बरस,

बारिश होगी, जीवन होगा,
हर समां रंगीन होगा,
हरियाली लहरायेगी,
कई मुखड़े खिल सी जायेगी,
नयी कोंपलें संग,
नयी जीवन की शुरुआत होगी,
सूखे डालों पर,
जब बूँदों की बरसात होगी,
हर कली को फूल और,
हर बाग़ को गुलशन कर जायेगी,
सावन की बूँदें जब,
प्यासी धरती से मिलने आएगी,
अब आँचल में बूँदें भर ले,
और याद उन्हें तू कर ले,
जिन्हे भूल गयी थी पिछले बरष,
ए बारिश जरा उधर भी बरस।