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Tuesday, 27 December 2016

अकेला

साहिल पे बैठा मैं,
समंदर की लहरें गिन रहा था,
घनघोर अँधेरा पसरा हुआ था,
अंदर और बाहर के हालात एक ही थे,
शायद वो रात,
अमावस की रात थी,
मेरा चाँद,
मुझसे दूर हो गया था,
पर आसमान में चमकते सितारे,
दिलासा दे रहे थे,
पैरो को छूकर जाने वाली,
लहरें भी कह रही थी,
तुम अकेले नहीं, 
हम सब तुम्हारे साथी हैं,
अब रोज साहिल में बैठ,
इन लहरों से बातें करना,
अच्छा लगता है,
वो तो दिल तोड़ गयी,
पर टूटे दिल को जुड़ने में,
वक़्त तो लगता है।

Monday, 26 December 2016

अभागिन

सूना है आँगन, सूने गलियारे,
सूनी है मन की सेज रे,
सुख गए हैं, आखों के आंसू,
हालत तो आकर देख रे,
चिट्ठी या तार, कुछ तो भिजवा दे,
लेने को मेरी टोह रे,
अब तो जिया न जाए अकेले,
तड़पे हैं जियरा रोज रे,
तड़प रही है रूह मेरी,
और कितना तड़पाओगे,
हर सुबह टूटता एक सपना,
कितने सपने दिखाओगे,
कर के सपने पूरे अपने,
जिस दिन वापस आओगे,
छोड़ गए थे जिस चौखट पे,
वही खड़ी पाओगे,
तुम कब आओगे, गले से लगाओगे,
पहना के मुझको, फूलों की माला,
कब अपने हाथों से सजाओगे ?