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Friday, 6 January 2017

आस

हर कदम पे तेरे साथ ही चला था,
ना जाने तू कैसे आगे निकल गयी,
किस्मत में जो लिखा था, उसे मिटा कर,
रेत की तरह तू, हाथों से फिसल गयी,
तुम तो हर पल साँसों में बसते थे,
तुम तो हर पल बाहों में रहते थे,
क्यूँ अब तुम करीब नहीं आते हो,
क्यूँ दर्द बन आँखों से बह जाते हो,
तू सीने की धड़कन थी, तुझमे ही जीता था,
जख्म लगे गर कभी मुझे, मुस्कान से तेरी सीता था,
घाव देकर उम्र भर का, तू कहीं और मुस्काती है,
किश्तों में आकर याद तेरी, दिल को बहुत सताती है,
मेरी दुनिया से गए तुम्हे एक ज़माना हो गया,
और हम, अब भी तुम्हारे लौट आने की आस लगाए बैठे हैं,
ग़मों की परछाई ने कर दिया मुझे अँधेरे के हवाले,
और हम, रौशनी के लिए अपना दिल जलाये बैठे हैं,
हम अब भी तुम्हारे लौट आने की आस लगाए बैठे हैं,
हम अब भी तुम्हारे लौट आने की आस लगाए बैठे हैं।

Written by: Upendra Prasad
Edited By: Abhisek Kumar Jha

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